नारी वंदनीय बारम्बार

इस सृष्टि में युगों-युगों से
यही विस्मय हर बार हुआ
नारी से ही इस सृष्टि में
जीवन का संचार हुआ!
जीवन का स्रोत हो तुम
प्राणों का आधार हो तुम
जीवन पालक भी तुम हो
प्रेम रूप साकार हो तुम!
सबसे पहले माता रूपी
ईश्वर से परिचय होता है
तब जाकर के जीव जगत में
जीवन चक्र आंरभ होता है!
बहन रूप मे जीवन का
एक प्यारा रूप सा दिखता है
स्नेह, प्रेम, मित्रता का
प्यारा सा संगम मिलता है!
पत्नी है रूप समर्पण का
है त्याग, प्रेम की परिभाषा
घर को ये घर है बनाती
जीवन में लाये एक आशा!
जब आती है बेटी बनकर
तो खुशियाँ अपार लाती है
जीवन को, तन, मन, धन को ये
फूलों जैसा महकाती है!
इन्हीं रूपों से खिला है जीवन
नारी तेरे अनन्त उपकार
कहा है ऋषियों ने भी ये तो
नारी वंदनीय बारम्बार!

रचयिता
भारती शर्मा,
सहायक अध्यापिका,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय देवबन्द देहात,
विकास खण्ड-देवबन्द,
जनपद-सहारनपुर।

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