देश की वन्दना
मैं अपने देश की वन्दना करता हूँ...
मैं ऐसे देश की वन्दना करता हूँ...
जिसके माथे को गंगा ने पावन किया...
मध्य क्षेत्र में जिसके बहे नर्मदा...
मैं तिरंगे झंडे की वन्दना करता हूँ...
मैं स्वतन्त्र देश की वन्दना करता हूँ...
इसके सिर को हिमालय ने श्यामल किया...
उत्तर में धरती का स्वर्ग काश्मीर खड़ा...
ये लहराते सागर इसकी कमर में मेखला है...
ये हिंद महासागर पैरों को पखारता है...
इसके आँचल में छ: ऋतुओं के नगीने जड़े...
राजस्थान में मरू और विन्ध्य में पठार घने...
मैं सारे धर्मों की वन्दना करता हूँ...
मैं विश्व शांति की कामना करता हूँ...
मैं नानक, बुद्ध की वन्दना करता हूँ...
मैं आदिवासी, वनवासियों की वन्दना करता हूँ...
मैं जन्मभूमि की वन्दना करता हूँ...
मैं कर्मभूमि की वन्दना करता हूँ...
रचयिता
संजय यादव,
इं०मी०प्रा०स्कूल लालई,
विकास खण्ड-खैरगढ़,
जनपद-फिरोजाबाद।
मैं ऐसे देश की वन्दना करता हूँ...
जिसके माथे को गंगा ने पावन किया...
मध्य क्षेत्र में जिसके बहे नर्मदा...
मैं तिरंगे झंडे की वन्दना करता हूँ...
मैं स्वतन्त्र देश की वन्दना करता हूँ...
इसके सिर को हिमालय ने श्यामल किया...
उत्तर में धरती का स्वर्ग काश्मीर खड़ा...
ये लहराते सागर इसकी कमर में मेखला है...
ये हिंद महासागर पैरों को पखारता है...
इसके आँचल में छ: ऋतुओं के नगीने जड़े...
राजस्थान में मरू और विन्ध्य में पठार घने...
मैं सारे धर्मों की वन्दना करता हूँ...
मैं विश्व शांति की कामना करता हूँ...
मैं नानक, बुद्ध की वन्दना करता हूँ...
मैं आदिवासी, वनवासियों की वन्दना करता हूँ...
मैं जन्मभूमि की वन्दना करता हूँ...
मैं कर्मभूमि की वन्दना करता हूँ...
रचयिता
संजय यादव,
इं०मी०प्रा०स्कूल लालई,
विकास खण्ड-खैरगढ़,
जनपद-फिरोजाबाद।

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