सबकी आँखों का तारा

मैंने जन्म लिया कुछ इस तरह..
कि सबकी आँखों का तारा बनी..

मुझे बेटों से कम न समझा..
मैं माता-पिता का सहारा बनी।

दो कदम आगे बढ़ी..
तो बहुत से शब्दों ने सराहा..

कभी कश्ती  डगमगायी यदि..
मैं खुद ही खुद का किनारा बनी।

कभी अबला न कहलाई मैं..
न आँखों में आँसू लायी मैं..

अपने दृढ़ निश्चय से गगन का..
चमकता हुआ सितारा बनी।

बेटी बन उपवन महाकाया..
अर्धांगिनी बनकर साथ निभाया..

माँ बन अपने प्यारे बच्चों के...
जीवन की खेवनहार बनी।

ख़ुद के लिए जीना सीख गयी मैं..
कर्तव्य अपने न भूल सकी मैं..

हक़ - फ़र्ज़ को साथ निभाकर..
हर प्रश्न का जवाब करारा बनी।।

रचयिता
पूजा सचान,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मसेनी(बालक) अंग्रेजी माध्यम,
विकास खण्ड-बढ़पुर,
जनपद-फर्रुखाबाद।

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