नारी तुम परिवर्तन हो

नारी तुम परिवर्तन हो
तुम हर समाज का दर्पण हो
तुम मूल भाव समर्पण हो
तुम पर ही सब कुछ अर्पण हो
किसी की माता, कहीं बहन हो
किसी की बेटी कहीं दुल्हन हो
क्यूँ  भयावह है घर का ही आँगन
क्यूँ  डरा-डरा सा है तन मन
क्यूँ  स्वच्छंद ना कोई रूप तुम्हारा
क्यूँ  ढूंढ रही हो सदा सहारा
कब तक चीखोगी  चिल्लाओगी
किस-किस से रोना गाओगी
यहाँ मानेगा कौन बात तुम्हारी
किस-किस को  व्यथा सुनाओगी
मुँह बंद तुम्हारा कर देंगे
कैसे आवाज़ उठाओगी
फिर भी यदि हिम्मत दिखलायी
इनके विरुद्ध आवाज़ उठाई
कभी कुलटा तुम्हें कहा जायेगा
कभी दुश्चरित्र कहलाओगी
यह समाज जीने ना देगा
ज़हर तुम्हें पीने ना देगा
बार-बार लज्जित तुम्हें कर के
यूँही मारेगा तरसाएगा
ना जिंदा मे गिनती होगी
ना मुर्दों में नाम लिखा जाएगा
कब तक  रहोगी तुम लाचार
कब तक सहोगी अत्याचार
शक्ति है तुम में अपार
ये भी मुझको बतलाना होगा
बदल सकती हो तुम संसार
तुमको कर दिखाना होगा

नारी तुम परिवर्तन हो
तुम हर समाज का दर्पण हो
तुम मूल भाव समर्पण हो
तुम पर ही सब कुछ अर्पण हो
 सुख  से  रहना है यदि तुमको
तो बदलो अपनी काया को
बदलो तुम इस वंश प्रथा को
अपने शरीर की छाया को
जिस पुत्र को जन्म दिया हो
उसका पालन सही करो
संस्कार उसमें अपार
और स्त्री जैसा प्रेम भरो
कोमलता उसमें भर दो तुम
राक्षसीय  प्रवृत्ति का नाश करो
ऐसे बालक आगे बढ़कर
जब तुम जैसे बन जाएँगे
तब बनेगा एक सभ्य समाज
तब सब सुख से  रह पाएँगे
फिर ना  कोई निर्भया होगी
ना दामिनी कोई कहलाएगी
देवी  सिर्फ मंदिर में ही ना
हर घर में पूजी जाएगी
नारी तुम परिवर्तन हो
तुम हर समाज का दर्पण हो
तुम मूल भाव समर्पण हो
तुम पर ही सब कुछ अर्पण हो

रचयिता
जैतून जिया,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय गाजू,
विकास खण्ड-कछौना,
जनपद-हरदोई।

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