चाह

चाह नहीं मैं बेटी बनकर,
घर का काम-काज करूँ।

चाह नहीं मैं पत्नी बनकर,
पति के दिल पर राज करूँ।

चाह नहीं मैं माँ बनकर,
खानदान की लाज बनूँ।

चाह नहीं कि अबला बनकर,
मैं सबकी मोहताज बनूँ।

चाह यही मैं पढ़-लिखकर,
अपने मस्तक पर ताज धरूँ।

चाह यही मैं चारदीवारी लांघ,
इस दुनिया पर राज करूँ।

चाह यही मैं नारी बनकर,
एक नया अंदाज बनूँ।

चाह यही मैं सबला बनकर,
बस खुद पर नाज करूँ।

रचयिता 
भूपसिंह भारती, 
शिक्षक,
रावमा विद्यालय पटीकरा,
खण्ड नारनौल, 
जिला महेन्द्रगढ़ (हरियाणा)
पिन 123001, 
मो0 9416237425

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