उस दिन महिला दिवस मनाना
जब न किसी भी घर-आँगन में,
तुम मुरझाती कलियाँ पाओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
कथनी से ही नहीं अपितु तुम,
मन से भी लिंगभेद मिटाओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
टूटे गर्व श्रेष्ठता का जब,
नर - नारी समान तुम पाओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
तोड़ सको दहलीज का बंधन,
अवसर जब समान दे पाओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
पत्नी, बहन, माँ और बेटी का,
थोड़ा सा तुम हाथ बँटाओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
नहीं तुम्हारे बस का कुछ भी,
कहकर ना तुम दर्प दिखाओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
काट बेड़ियाँ नारी की सब,
जब स्वच्छंद उड़ान दे पाओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
थोप स्वयं की जिम्मेदारी,
उसकी स्वतंत्रता तुम न चुराओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
कर्तव्य मात्र का गीत न गाकर,
उसके अधिकार समझ तुम पाओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
संघर्ष-जीत पर स्त्री की तुम,
अपना मन कुंठित ना पाओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
जब नारी की क्षमताओं का,
हृदय से तुम स्वागत कर पाओ,
उस दिन तुम यह दिवस मनाना।
रचयिता
पूनम दानू पुंडीर,
सहायक अध्यापक,
रा०प्रा०वि० गुडम स्टेट,
संकुल-तलवाड़ी,
विकास खण्ड-थराली,
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

बहुत ही सार्थक कविता
ReplyDeleteआभार🙏
DeleteSuper
ReplyDeleteThank
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