नारी महान

लाडली बिटिया को जब एक दिन विदा घर से किया जाता है,

पराया घर देखो उससे सहजता से कैसे अपनाया लिया जाता है।

सुबह हो गई सरपट- सरपट देखो उसका काम दिख जाता है,

फिर भी कोई चूक हुई तो सुनती तुमको काम नहीं आता है।

एक अकेली नारी दिनभर देखो, जाने क्या- क्या काम करे,

उसका कोई भुगतान करे तो शायद तुमको पता चले ।

घर का बजट कैसे चलता ये हर कोई जान नहीं पाता है,

कहते हैं जी घर की औरत को उसका व्यापार नहीं आता है।

उठती सबसे पहले है वो, सोना उसका सबसे अंत में होता है,

होती है पीड़ा में खुद वो, लेकिन चेहरा देखो मुस्कान जगाता है।

यूँ ही रिश्तों को सँभालते कब यौवन बुढ़ापे में ढल जाता है,

क्यों कभी किसी को उसकी खुशियों का ख्याल नहीं आता है?

घर, दफ्तर  सँभालने का हुनर उससे बखूबी निभाया जाता है,

फिर क्यों लोगों के द्वारा उसको अबला नारी समझा जाता है?

बेटी है वो बहन है वो, उसका तो हर घर - घर से नाता है,

नारी का अपमान न करना वह  सबकी भाग्य विधाता है।

            

रचयिता 
रामेश्वरी लिंगवाल,
सहायक अध्यापक,
राजकीय कन्या उच्च प्राथमिक विद्यालय ज्ञानसू (नवीन),
विकास खण्ड-भटवाड़ी,
जनपद-उत्तरकाशी,
उत्तराखण्ड।



Comments

  1. नारी तू नारायणी
    तुझी से ये संसार 💐

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