बेटी की चाह

माँ मुझको भी बस्ता ला दे, मैं भी पढ़ने जाऊँगी

रंग बिरंगी किताबों से मैं अपने ख़्वाबों को सजाऊँगी।

बजती जब स्कूल की घंटी, मेरा मन ललचाता है

यूनिफॉर्म  पहनकर मैं भी सुंदर सी बन जाऊँगी।।


माँ मुझको भी....


ए बी सी डी पढ़कर मैं भी अपनी शान दिखाऊँगी

क ख ग घ के संग दिल से दिल के तार मिलाऊँगी।

रोज सवेरे उठकर, घर के सारे काम करा दूँगी,

फिर सखियों के संग मिल कर, गिनती मैं दोहराऊँगी।


माँ मुझको भी....


रंग बिरंगे खेल खिलौने, स्कूलों में मिलते हैं

लूडो कैरम खेल खेल के, मैं भी छक्के उड़ाऊँगी।

सीख सिखाते सब शिक्षक मिल, राह नई दिखलाते हैं,

देश प्रेम की नई नई सी, कविता रोज सुनाते हैं।।


माँ मुझको भी....


पढ़ पढ़ कर के सभी किताबें मैं भी मैम बन जाऊँगी

पापा के जैसे फिर मैं भी पैसे खूब कमाऊँगी

तेरी आँखों के सब सपने, मैं पूरे करवाऊँगी

बेटी भी है देश का गौरव, सबको मैं दिखलाऊँगी।


माँ मुझको भी...


बोझ नही है ये बेटी भी, अगर दिला दो शिक्षा उसको

अगर मिले अवसर उसको, सब कुछ वो कर जाएगी।

देश की खातिर मर सकती है, सीमा पर प्रहरी बनकर

आसमान में उड़ सकती है, कल्पना जैसी भी बनकर।


माँ मुझको भी...


कोमल हूँ कमजोर नहीं हूँ, बेटी हूँ पर बोझ नहीं हूँ

ममता स्नेह की देवी हूँ तो चंडी भी बन सकती हूँ

नारी हूँ मैं नर पर भारी, जग को अब दिखलाऊँगी।

शिक्षा को हथियार बनाकर, समर जीतकर आऊँगी।


माँ मुझको भी...

मेरे भी अरमान बहुत हैं, पूरा करने जाऊँगी

शिक्षा की एक जोत जलाकर, घर-घर अलख जगाऊँगी

शिक्षा का अब ज्ञान फैलाकर, गाँव को शहर बनाऊँगी

पढ़ लिख कर शिक्षित होकर, मैं सब की शान बढ़ाऊँगी।।


माँ मुझको भी बस्ता ला दे मैं भी पढ़ने जाऊँगी।।


रचयिता
मंजरी सिंह,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय उमरी गनेशपुर,
विकास खण्ड-रामपुर मथुरा,
जनपद-सीतापुर।



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