औरतें
ना जाने कब? कैसे? क्यों? मचलना छोड़ देती हैं।
दौड़तीं इतना 'औरतें' चलना छोड़ देती हैं।।
भोर के तारे सी उगतीं,
दिनभर सूरज सी तपतीं,
ख़त्म कर्तव्य हों कभी ना,
अखबार सी वो रोज छपतीं
जीवन की संध्या हो, पर ढलना छोड़ देती हैं।
कभी पिता कभी पति से डरकर,
अपने पंखों को हैं कतरतीं
करके उड़ान से समझौता,
इंतजार अवसर का करतीं
सिल-सिल कर पंखों को, उड़ना छोड़ देती हैं ।
दीपक सी जलती हैं हर दिन,
और अगरबत्ती सी महकें।
पर सखियों से जब है मिलतीं,
छोटी चिड़ियों सी वो चहकें।।
संग मिलकर उनके, वो चुप्पी तोड़ देती हैं।
रचयिता
पूनम गुप्ता,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय धनीपुर,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

Comments
Post a Comment