महिला सशक्तीकरण 248, निर्मला आर्या, उत्तराखंड


*महिला सशक्तिकरण विशेषांक-246*


*मिशन शिक्षण संवाद परिवार की बहनों की संघर्ष और सफलता की कहानी-*

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*(दिनांक-11 मार्च 2021)*
नाम - निर्मला आर्या
पद - सहायक अध्यापक
विद्यालय- रा.क. उ.प्रा.वि. मन्यूड़ा गरुड़, जनपद-बागेश्वर, उत्तराखंड
*सफलता एवं संघर्ष की कहानी*👉🏻
मेरी नियुक्ति शिक्षा विभाग में एक अध्यापक के रूप में 1 जुलाई 2003 को हुई। उस समय अध्यापन कार्य मेरे लिए एक चुनौती थी। जिस तरह भारत के भविष्य को संवारने के लिए ईश्वर ने मुझे चुना मैं कैसे उस परीक्षा में सफल रहूं, और नन्हे मुन्ने प्यारे बच्चों का भविष्य बनाने का पहला कदम मजबूत बनाऊ।
मेरे सामने मेरे अधिकार भी थे, और कर्तव्य भी। जैसे-जैसे शिक्षण कार्य साल दर साल बढ़ता गया मेरे अधिकारों का ग्राफ घटता गया,और कर्तव्यों का ग्राफ बढ़ता गया। बच्चो के प्रति, अभिभावकों के प्रति,समाज के प्रति, देश के प्रति, मेरे कर्तव्य क्या है और क्या मैं अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी और सच्चाई से कर पा रही हूं,या मुझे और बेहतर करना होगा। ये बातें मेरी अंतरात्मा में हमेशा प्रस्फुटित होती रहती थी।
मेरा कर्तव्य है उन बच्चो के प्रति जिन बच्चों को समाज ने मेरे हाथों में सौंपा है। मैं ज्ञानरूपी सरोवर में उन्हें तरबर कर दूं।  ज्ञान रूपी प्रकाश से उनका जीवन प्रकाश मान कर दूं।
बच्चे भगवान का रूप होते हैं यह सत्य है मैंने कितनी बार अपने सामने उक्त पंक्ति चरितार्थ होते हुए महसूस किया है मैं विद्यालय में एक क्षण भी बर्बाद नहीं होने देती हूं।मुझे विद्यालय में बच्चों के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई देता है। बच्चे मेरी आन, बान और शान है। उनकी हर कठिनाईयों को दूर करने का प्रयास करती हूं। उनके घर की दिनचर्या व परिस्थितियों के बारे में जानने की कोशिश करती हूं,और उन बच्चों की समस्याओं को दूर करने का प्रयास करती हूं, चाहे वह समस्या आर्थिक हो या घरेलू हिंसा से संबंधित।
मैं मानती हूं कि नवाचारी शिक्षा बच्चों के सर्वांगीण विकास का एक अच्छा माध्यम है पर मैं यह कदापि नहीं चाहती हूं कि नवाचारी शिक्षा मूल शिक्षा में हावी हो जाए,और हम शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटक जाए हमें बच्चों का प्रत्येक पहलू से विकास करना है लेकिन एक तय सीमा के अंतर्गत रहकर, तालमेल के साथ।
मैं अपने कर्तव्यों को विद्यालय समय (खुलने व बंद होने) व अवकाश (रविवार, ग्रीष्म व शीतकालीन) मैं बांधना नहीं चाहती हूं मेरे कर्तव्य प्रत्येक दिन, प्रत्येक पल मेरे साथ जुड़े हैं जिन्हें निभाने का मैं भरसक प्रयास करती हूं।
मैं एक सुगमकर्ता के रूप में अभिभावकों से मिलती हूं, और बच्चों की समस्याएं जानने की कोशिश करती हूं यदि बच्चा  स्कूल नही आ रहा है तो क्यो नही आ रहा है, और यदि आ रहा है तो वह किस मनोदशा में है कहीं घर का वातावरण उसके सीखने में बाधा तो उत्पन्न नहीं कर रहा है। मैं जानती हूं कि हमारे बच्चे निर्धन परिवार से है इसलिए हर संभव उनकी छोटी-छोटी जरूरतों (जैसे स्टेशनरी संबंधी) को पूरा करने का प्रयास करती हूं इस कार्य में मुझे बड़ा आनंद आता है, बच्चे भी एक मां की तरह मेरे पास दौड़े चले आते हैं और पेन पेंसिल आदि जरूरत की चीजें ले जाते हैं।
मैंने सीखने- सिखाने की प्रक्रिया को कभी कक्षा कक्ष के अंदर सिमित नहीं रखा। मैं प्रार्थना से पूर्व,विद्यालय समय के पश्चात, रास्ते में चलते-चलते भी बच्चों को कुछ ना कुछ सिखाती रहती हूं प्रत्येक पाठ को कहानी के रूप में, गीत के रूप में,कविता के रूप में जो उचित हो बच्चों के सामने प्रस्तुत करती हूं। जिसे बच्चे खूब पसंद करते हैं और शीघ्र सीख लेते हैं इस प्रकार सीखने-समझने में बच्चों को बहुत आनंद आता है और मुझे भी।
अंत में मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि, जब तक मुझे सेवा का अवसर मिले पूरी निष्ठा व लगन के साथ बच्चों के प्रति, समाज के प्रति, और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करु।
“वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जाएं।"

*संकलन:-*
*टीम मिशन शिक्षण संवाद*

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