रुप अनेकों धरती हो
तुम ही शक्ति स्वरूपा हो,
तुम ही धुरी परिवार की|
सेहत, स्वास्थ्य सभी का उत्तम,
बस चाह यही हर बार की|
अन्नपूर्णा रूप तुम्हारा,
पोषण से भर देती हो|
ओ स्त्री तुम इक काया में,
रुप अनेकों धरती हो....
बुझे से मन और बोझिल तन में,
ऊर्जा सी भर देती हो|
ओ स्त्री तुम इक काया में
रुप अनेकों धरती हो.....
काश! समझ लें त्याग तुम्हारा,
हर जन अपने आँगन में|
अपने गौरव की गाथा का,
तुम बखान न करती हो|
ओ स्त्री तुम एक काया में
रुप अनेकों धरती हो......
रचयिता
भारती खत्री,
सहायक अध्यापक,
उच्च प्राथमिक विद्यालय फतेहपुर मकरंदपुर,
विकास खण्ड-सिकंदराबाद,
जनपद-बुलंदशहर।

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