माँ, मैं जीना चाहती हूँ
माँ मैं जीना चाहती हूँ,
तुम्हारी जन्नत सी गोद में खेलना चाहती हूँ ।
तुम्हारा वो कोमल सा प्यार भरा स्पर्श माँ,
जिसे महसूस करती हूँ मैं अंदर से।
चूमना चाहती हूँ उन हाथों को,
जिससे तुम थपकी देकर रात में मुझे सुलाती हो माँ।
अपनी नन्हीं सी इन आँखों से,
देखना चाहती हूँ इस खुबसूरत दुनिया को।
माँ मैं भी खेलना चाहती हूँ तुम्हारे साथ
वो गुड्डे गुड़ियों का खेल......
सुनना चाहती हूँ वो परियों की कहानी माँ!
पापा की दुलारी हूँ मैं, सुनकर उनकी पुकार
उछल जाती हूँ गेंद की तरह, अपने इस छोटे से घर में।
पहनना चाहती हूँ माँ वो नन्हा सा स्वेटर,
बिना मापे जिसे बुनती हो बस मेरे लिये।
आखिर क्या बात है जो तुम जन्म नहीं देना चाहती माँ!
क्या बस इतनी सी गलती है मेरी कि मैं एक बेटी हूँ माँ.......
मेरी माँ, मेरी प्यारी माँ!
रचयिता
मीरा कन्नौजिया,
प्राथमिक विद्यालय हरखपुर,
विकास खण्ड-सिकरारा,
जनपद-जौनपुर।
तुम्हारी जन्नत सी गोद में खेलना चाहती हूँ ।
तुम्हारा वो कोमल सा प्यार भरा स्पर्श माँ,
जिसे महसूस करती हूँ मैं अंदर से।
चूमना चाहती हूँ उन हाथों को,
जिससे तुम थपकी देकर रात में मुझे सुलाती हो माँ।
अपनी नन्हीं सी इन आँखों से,
देखना चाहती हूँ इस खुबसूरत दुनिया को।
माँ मैं भी खेलना चाहती हूँ तुम्हारे साथ
वो गुड्डे गुड़ियों का खेल......
सुनना चाहती हूँ वो परियों की कहानी माँ!
पापा की दुलारी हूँ मैं, सुनकर उनकी पुकार
उछल जाती हूँ गेंद की तरह, अपने इस छोटे से घर में।
पहनना चाहती हूँ माँ वो नन्हा सा स्वेटर,
बिना मापे जिसे बुनती हो बस मेरे लिये।
आखिर क्या बात है जो तुम जन्म नहीं देना चाहती माँ!
क्या बस इतनी सी गलती है मेरी कि मैं एक बेटी हूँ माँ.......
मेरी माँ, मेरी प्यारी माँ!
रचयिता
मीरा कन्नौजिया,
प्राथमिक विद्यालय हरखपुर,
विकास खण्ड-सिकरारा,
जनपद-जौनपुर।

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