कक्षा कक्ष में चॉक का बलिदान

मेरी मोहब्बत का भी,
 क्या सिला दिया मुझे?
ब्लैक बोर्ड पर घिसकर,
बेदर्दी से मिटा दिया मुझे।
परोपकार का महत्त्व बताकर,
आज दधीचि बना दिया मुझे।

आज शिक्षक के हाथ में आते ही,
अपने भाग्य पर, बड़ा इठलायी थी।
पर गुरु जी की मनोभावना को,
मैं, बिल्कुल भी समझ न पायी थी।
आज धूल बन, कक्ष में बिखर गयी,
बस इतना सा जीवन मिला मुझे।

दर्द सहकर भी, मुस्कराना पड़ा मुझे,
देश का भविष्य बनाने को।
पर मुझ पर जरा दया न आयी,
कभी भी, इस बेदर्द ज़माने को।
गुरु जी के पवित्र हाथों ने आज,
मुझ अधम को मोक्ष दिला दिया।

है भोले बच्चों, तुम नहीं बेवफा,
पर मुझसे, तुमको प्यार नहीं है।
मेरी जैसी परोपकारी का क्या?
तुम पर कोई उपकार नहीं है।
तुम्हारा भविष्य बनाने को देखो,
मुझे आज बेदर्दी से मिटा दिया।

क्या मेरी क़ुरबानी को तुम,
कभी जीवन में याद करोगे?
उत्तम शिक्षा ले, जीवन सार्थक कर,
तुम दिल मानवता से आबाद करोगे।
तुमने स्त्री जैसा, मुझे नाम दिया था,
 मैंने स्त्रियों का धर्म निभा दिया।

रचयिता
प्रदीप कुमार,
सहायक अध्यापक,
जूनियर हाईस्कूल बलिया-बहापुर,
विकास खण्ड-ठाकुरद्वारा,
जनपद-मुरादाबाद।

विज्ञान सह-समन्वयक,
विकास खण्ड-ठाकुरद्वारा।

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