भारतेन्दु हरिश्चन्द

आधुनिक हिंदी साहित्य के    
            पितामह
     भारतेन्दु हरिश्चन्द

सितम्बर था नौ सन अठरा सौ पचास का पुण्य भूमि काशी में जन्म हुआ था।

हरिश्चन्द नाम उपाधि थी भारतेंदु हिंदी साहित्य का सृजन किया था।

खड़ी बोली अवधी का सिद्ध साहित्यकार, प्राचीन-नवीन का मिलन किया था।

5 वर्ष में मात पितु साथ छोड़ गए, विमाता का विष शमन किया था।।

निज भाषा उन्नति से हिन्द का विकास होय यही मूल उन्नति का मंत्र बताया है।

1857 से 1900 तक का कालखण्ड इसलिए भारतेंदु युग कहलाया है।।

संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू भाषाएँ सब सीखी स्वाध्याय से।

राजा सितारे हिन्द से सीखी आंग्ल भाषा उनके घर जाते रहे आप शिष्य भाव से।।

हरिश्चन्द मैगजीन बाला बोधनी और कवि वचन सुधा पत्रिका निकाली थी।

सत्य हरिश्चन्द नीलदेवी अंधेर नगरी भारत दुर्दशा की छटा निराली थी।

भावात्मक, व्यंग्यात्मक, उदबोदन शैलियाँ रीतिकालीन रसपूर्ण साहित्य है।

प्रेम सरोवर, प्रेम माधुरी प्रेम तरंग, कविता संग्रह जातीय संगीत है।।

कुछ आपबीती, कुछ जगबीती, गद्य में एक कहानी वैष्णव सर्वस्व है।

कराती यथार्थ बोध देती है नवीन ज्ञान,अज्ञान,अशिक्षा मिट जाते वैमनस्य हैं।।

15 ही वर्ष से साहित्य साधना शुरु 35 की आयु में देहावसान हो गया।

गिरधर का लाडला नवजागरण का अग्रदूत हिंदी साहित्य का रसखान सो गया।।

रचयिता
राजकुमार शर्मा,
प्रधानाध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय चित्रवार,
विकास खण्ड-मऊ,
जनपद-चित्रकूट।

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