रूपवती वर्षा

वर्षा ऋतु है कितनी सुन्दर;
कितने सुंदर इसके रूप!
झीनी भीनी काली रातें;
रिमझिम बूँदें करती बातें!

ऊपर आसमान में बादल;
पहाड़ के जैसे दिखते हैं!
जमीं पे प्यारे ताल तलैया;
दर्पण के जैसे दिखते हैं!

सांझ समय का छुपता सूरज;
अजब छटा को है बिखराए!
रंग बिरंगे फूलों बाला सतरंगी आंचल फैलाए!
वर्षा ऋतु है कितनी*********

रचयिता
रतन लाल गंगवार,
प्रधानाध्यापक
प्राइमरी स्कूल नौगवां संतोष,
विकास खण्ड-बिलसंडा,
जनपद-पीलीभीत।

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