हम कोशिश कर रहे हैं
हम खड़े होने की,
कोशिश कर रहे हैं।
माना थोड़े हौंसले,
कम हो रहे हैं।
फिर भी हम,
खुद को सहारा दे रहे हैं।
बंद आँखों के,
स्वप्न अब खो रहे हैं।
माना थोड़े,
स्वर विरोधी उठ रहे हैं।
था यकीं खुद पर,
वो सुर अब थम रहे हैं।
थे अकेले कल तलक,
आज सारे मिल रहे हैं।
बंद थे जो हृदय,
वो अब खिल रहे हैं।
हम अकेले ही चले थे,
कारवां अब बन रहे हैं।
हम खड़े होने की,
कोशिश कर रहे हैं।
बंद आँखों के
स्वप्न अब खो रहे हैं
दिन में जो देखे,
वो पूरे हो रहे हैं।
रचयिता
डॉ0 रंजना वर्मा,
प्राथमिक विद्यालय बैलो,
विकास खण्ड-भटहट,
जनपद-गोरखपुर।
कोशिश कर रहे हैं।
माना थोड़े हौंसले,
कम हो रहे हैं।
फिर भी हम,
खुद को सहारा दे रहे हैं।
बंद आँखों के,
स्वप्न अब खो रहे हैं।
माना थोड़े,
स्वर विरोधी उठ रहे हैं।
था यकीं खुद पर,
वो सुर अब थम रहे हैं।
थे अकेले कल तलक,
आज सारे मिल रहे हैं।
बंद थे जो हृदय,
वो अब खिल रहे हैं।
हम अकेले ही चले थे,
कारवां अब बन रहे हैं।
हम खड़े होने की,
कोशिश कर रहे हैं।
बंद आँखों के
स्वप्न अब खो रहे हैं
दिन में जो देखे,
वो पूरे हो रहे हैं।
रचयिता
डॉ0 रंजना वर्मा,
प्राथमिक विद्यालय बैलो,
विकास खण्ड-भटहट,
जनपद-गोरखपुर।

बहुत सुंदर लिखा
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