हौसला

धूप की डगर से छाँव का सफर
नामुमकिन तो नहीं,
बस चल पड़ी हूँ ....बस चल पड़ी हूँ .....
उफ अकेली पड़ रही,
देख राह डर रही।
ना..मैं साथ हूँ तेरे....
झूठ बात है तेरी....
मन में झाँक तो जरा,
बनके हौसला तेरा
मैं ही साथ चल रहा।
धूप की डगर से छाँव का सफर
नामुमकिन .......................
उफ पसीना बह रहा,
धूप चिलमिला रही।
ना....ये भ्रम है तेरा....
झूठ बात है तेरी....
धन में सोच तो जरा,
बनके आँचल तेरा
नभ ही लहरा रहा।
धूप की डगर से छाँव का सफर
नामुमकिन .......................
उफ ना छोर मिल रहा,
लगे के मैं भटक रही।
ना..तू दूर अब नहीं..
झूठ बात है तेरी...
बात मान तो जरा
बनके दास तेरा
वो तो पास आ रहा।
धूप की डगर से छाँव का सफर
नामुमकिन ........................
उफ अब कदम गिर रहे,
साँस थम सी रही।
ना..तू चुस्त है अभी...
झूठ बात है तेरी ...
जोश मार तो जरा,
बनके हकीकत में आज,
ख्वाब पूरा हो रहा।
अब है वक्त साथ में,
देख छाँव आ गयी।
रूकके दो घड़ी यहाँ,
चलना हैं तुझे अभी।
ना अकेली थी कभी,
ना अकेली तू अभी।
मैं रहूँगा साथ में,
हर कदम हर घड़ी।
हौसला हूँ मै तेरा,
मै ही भगवान हूँ।
धूप  की डगर से छाँव का सफर,
नामुमकिन अब नहीं......
हाँ चल पड़ी हूँ..........
हाँ चल पड़ी हूँ॥

रचयिता
कोमल त्यागी,
सहायक अध्यापक,
आदर्श प्राथमिक विद्यालय(अंग्रेजी माधयम) ट्याला,
जनपद-हापुड़।

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