हार कैसे मान लूँ

चलती रही उस राह पर,
     बिखरें जहाँ काँटे हजार।
मुश्किलें कितनी मिलीं,
    स्वप्न करने को साकार।
बढ़ते कदम को रोक दो!
     चीखती थीं हर दिशाएँ,
आरामगाह जिन्दगी की,
     ठाँव देती थीं हवाएँ।
रुकना तो दूर, मैंने ....
    सोचा भी, नहीं इस ओर।
जब तक नहीं मिली,
      मुझे रोशनी की छोर।
खुद से खुद का एक ही सवाल,
   जिस पर हर मुश्किलें भूला दूँ।
पत्थर का लकीर, वह सवाल
       "हार कैसे मान लूँ"।

रचयिता
निधि लता सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय नईयापार खुर्द,
विकास क्षेत्र-पिपराइच, 
जनपद-गोरखपुर।

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