सारस और लोमड़ी
सारस और लोमड़ी वन में,
साथ-साथ थे रहते।
प्यार के किस्से उन दोनों के,
सभी जानवर कहते।
सारस के ऊपर बैठ लोमड़ी,
झील घूम कर आती।
और मित्र सारस को अपने,
जंगल की सैर कराती।
यह सिलसिला वर्षों से था,
अविराम अनवरत जारी।
किसी बात को लेकर उनमें,
तकरार हो गई भारी।
मनमुटाव रख मन के अंदर,
वे तने-तने दोनों रहते।
दिखते साथ मगर वे दोनों,
मुँह से कुछ न कहते।
बहुत दिनों के बाद मित्रता,
पुनः हो गई दोनों में।
पर गाँठ एक थी बैठ चुकी,
उनके दिल के कोनों में।
चालाक लोमड़ी ने सारस को,
दावत पर घर बुलाया।
छिछली प्लेट में स्वादिष्ट खीर,
आगे उसके बढ़ाया।
खा न सका वह खीर मजे से,
मन ही मन गुस्साया।
और दुखी मन से वह सारस,
वापस झील में आया।
बदला उतारने की नीयत से,
एक रोज वह बोला दोस्त।
आना तुम मेरे घर एक दिन,
परोसूँगा गर्म सूप व गोश्त।
भरकर मन में लालच अपने,
चली लोमड़ी झूम-झूम।
बड़ा मजा आएगा जब वह,
खाएगी बर्तन चूम-चूम।
लंबी गर्दन की भरी सुराही,
गर्म सूप से सारस लाया।
मुँह लोमड़ी का तो उसमें,
घुस भी तक न पाया।
मौन रही कुछ देर लोमड़ी,
सोचके फिर पछताई।
हाथ जोड़ सारस से बोली,
मुझे माफ कर देना भाई।
जैसे को तैसा एक मुहावरा,
यह कहानी हमें बतलाती।
धोखा कभी न करो मित्र से,
बच्चों को यह सिखलाती।
रचयिता
अरविन्द दुबे मनमौजी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अमारी,
विकास खण्ड-रानीपुर,
जनपद-मऊ।

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