महिला दिवस

 जन्म से लेकर इस धरा पर,

 अविरल बही कहानी है।

 हृदय वेदना पल-पल की,

 महिला को याद जुबानी है।


 ना समझ सका कोई इस दर्द को,

 ना इसका कोई गुमान है।

नारी शक्ति का रूप है,

बस इतना ही अनुमान है।


 जैसे अल्पना बिना रंगों की,

 महिला के बिन घर है सूना।

 नारी सरगम घर संसार की,

 गुन गुन गाता ज्यों फूल पर भंवरा।


 घर आँगन की डोर है नारी,

 फिर सम्मान क्यों नहीं मिलता है..?

 नारी के बिन जग है सूना,

 पुरुष मन क्यों नहीं सहता है..?


 सदियों से नारियों ने इस जग में,

 अपना नाम कमाया है।

 नहीं क्षेत्र है कोई जिसमें,

 ना परचम लहराया है।


 महिला दिवस के दिन ही क्यों..?

 नारी को सम्मान मिले...?

 हर दिन की अटल भागीदारी,

 फिर दिन विशेष को क्यों मान मिले..?


 दिवस खास की कहाँ जरूरत..?

 सब मन में तनिक स्थान रखो।

 पत्थर में नहीं है देवी माता,

 घर में है यह ध्यान रखो।


 कोमल है कमजोर नहीं है,

 सुदृढ़, शिक्षित है, नहीं बेचारी है।

 कंधे से कंधा मिलाने वाली,

 समानता की अधिकारी है।


 धरती माता अपने हृदय पर,

 जितना बोझ उठाती है।

 प्राण भेद कर नारी ही,

 सृष्टि नयी रचाती  है।


 शुरुआत करनी होगी खुद से,

 शिक्षा संग संस्कार मिले।

 भेद करे ना नर-नारी का,

 दोनों को मान सम्मान मिले।


रचयिता

बबली सेंजवाल,
प्रधानाध्यापिका,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय गैरसैंण,
विकास खण्ड-गैरसैंण 
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।



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