नव युग की नारी
अपनी सोच को बदलो न
कोमल हैं कमजोर न समझो
हम नव युग की नारी हैं
ओस की बूँद न समझो हमको
अपनी सोच को बदलो न
सीता और सावित्री हम हैं
हम झाँसी की रानी हैं
कोई वस्तु विशेष न समझो
अपनी सोच को बदलो न
हाथों में मेहंदी के संग
तलवार चलाना आता है
सबला हैं अबला न समझो
अपनी सोच को बदलो न
कंधे से कंधा मिलाकर
चलना हमको आता है
बस एक अवसर हमको दे दो
अपनी सोच को बदलो न
अपनी हर जिम्मेदारी को
मन से हम निभाते हैं
थोड़ा सा विश्वास तो कर लो
अपनी सोच को बदलो न
रचयिता
शालिनी शर्मा,
सहायक अध्यापक,
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय छापुर,
विकास खण्ड-भगवानपुर,
जनपद-हरिद्वार,
उत्तराखण्ड।

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