फिर से स्कूल चले हम

सूना था आँगन, कमरे खाली थे;

खामोश थी किलकारी, हर जगह वीरानी थी।


सुबह प्रार्थनाओं की गूँज, गुम हो गई थी कहीं पर,

कक्षाओं की घंटी की आवाज़ जैसे भूल गए थे सब।


कोरे - कोरे श्यामपट्ट पड़े थे ऐसे,

जैसे अपना उत्साह वो भूल गए हों;


कोने में कहीं दुबके चाक और डस्टर,

आलस खा रहे थे वो वहीं पड़े -2 ही।


खेल का मैदान भी इस सोच में डूबा,

आखिर कहाँ गायब हो गई थी चहलकदमी।


ठंडा पड़ा था चूल्हा रसोई में कहीं पर,

थाली के लिए ना अब लगती कोई दौड़ थी।


"उसने मेरी कलम चुरा ली,

ना जाने कहाँ मेरी पुस्तक छुपा दी"

हुए बहुत दिन, अब ये शिकायत ना आती।


क, ख, ग, घ का  कमरों से अब शोर ना आता,

ना ही  पीछे -2 मेरी कोई कविता दोहराता।


लेकिन अब बस ख़त्म हुई ये उदासी,

स्कूल की बगिया में वापस आ गई हरियाली।✍️✍️


रचयिता
हिना सिद्दीकी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय कुंजलगढ़,
विकास खण्ड-कैंपियरगंज,
जनपद-गोरखपुर।

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