भ्रूण बेटी की करुण पुकार

तर्ज-बोल....."छुप गया कोई रे"

 मैं भी देखना चाहूँ दुनिया,
 सुन ले मेरी मात री,
 मुझको बचा ले री माता,
 जुल्म मेरे साथ री,
 बेटों से भी ज्यादा बेटी,
 आज्ञाकारी होती है,
 काम कौन सा ना कर सकती,
 जो बेटी भारी होती है,
 क्यों मेरी जिंदगी खोती है,
 यह जीवन तेरे हाथ री,
 मुझको बचा ले री माता,
 ये जुल्म......
 सावित्री बिन अश्वपति की,
 नहीं पहचान  थी,
 प्राण बचाए भाई माँगा,
 वह शक्ति महान थी,
 बेटों से गुणवान थी वो,
 यमराज से की मुलाकात री,
 मुझको बचा ले री माता,
ये जुल्म......
 मैं भी पैदा कर सकती हूँ,
 उधम जैसे वीर माँ,
 समर्थ गुरु राम जैसा,
 बदल दे तकदीर माँ,
 सोच ले आखिर यह तो माँ,
 के तू भी नारी जात री,
 मुझको बचा ले री माता,
ये जुल्म......
 जो घर में हो कमी खाने की,
 भूखी मैं रह लूँगी,
 परिवार के सारे दुख माँ,
 हंस हंस के सह लूँगी,
 आज तो कुछ कह सुन माता,
 मेरी ये अंतिम मुलाकात री
 मुझको बचा ले री माता,
 यह जुल्म मेरे साथ री,

रचयिता
ऋचा सिंह मलिक,
सहायक अध्यापिका,
कम्पोज़िट विद्यालय सुल्तानपुर,
विकास खण्ड-मुरादनगर, 
जनपद-गाजियाबाद।


Comments

  1. Wow ! It is really a heart touching composing. The writer, Mrs. Richa Malik has proved that real feelings of heart, if drawn in words, always descends to the very depth of reader's heart.

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