दहेज हत्या

अभी-अभी थीं पड़ी भांवरें
अभी अभी बाजी शहनाई।
एक अपरिचित चेहरा देख
मैं कितनी सकुचि शरमाई।।

सोलह सावन बीत गए
निज बाबुल की अंगनाई में।
छुड़ा दिए हैं मात पिता सब
दो दिन की शहनाई ने।।

नयी जगह में नये लोग थे
रस्मों रिवाज थे नये-नये।
अलग-अलग आदेश थे सबके
चेहरे थे सब नये-नये।।

दो दिन बाद देखा दहेज तो
तानों की बौछार पड़ी।
जब करी समीक्षा उन लोगों ने
फोर व्हीलर की बात चल पड़ी।।

बापू ने अपनी क्षमता भर
पूरा दहेज का दान दिया।
पर उनकी नजरों में अब भी
दहेज में हमको कुछ न दिया।।

फोर व्हीलर का ताना देकर
बेटी को उत्पीड़ित करते।
बापू ढिग भेजा सन्देशा
गाड़ी की नित माँग करते।।

बीते कुछ दिन‌ इसी तरह से
एक दिन निर्मम कार्य किया।
तेल डाल मिट्टी का सिर पर
बेटी को जिंदा जला दिया।।

सुनते ही टूटा पहाड़ था
माँ मूर्छा खा बेहोश हुई।
हृदयाघात से पिता विदीर्ण था
मन की सुध बुध बिगड़ गई।।

आओ हम संकल्प करें सब
ऐसा कुकृत्य न होने देंगे।
इस दहेज दानव को देश से
समूल नष्ट अब हम कर देंगे।।
             
रचयिता
बी0 डी0 सिंह,
सहायक अध्यापक,
उच्च प्रथमिक विद्यालय मदुंरी,
विकास खण्ड-खजुहा,
जनपद-फतेहपुर।

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