आत्ममंथन

कितने वर्षों बाद गगन में निर्मल सौन्दर्य छाया है,
मानो धरती माँ ने स्वच्छता का बीड़ा उठाया है।

पतित पावनी गंगा ने भी निर्मल नीर बहाया है,
कई दशकों बाद गंगा में जल पीने योग्य आया है।

पर्यावरण प्रदूषण ने जो हाहाकार मचाया था,
वसुधा ने कुछ दिन में हमको सबक सिखाया है।

हे मानव तूने जो जग में ऐसा पाप फैलाया है,
आज उन्हीं कर्मो का फल तेरे समक्ष आया है।

हमको प्रकृति के संरक्षण को ईश्वर ने था जन्म दिया,
हमने इसे जागीर समझ प्रतिदिन इसका शोषण किया।

कहीं परमाणु परीक्षण हुए कहीं आगजनी करवाई है,
वन देवी तिल-तिल रोई उसने अश्रुधार बहाई है।

धरती जंगल गगन ना छोड़े जल में प्रदूषण फैलाया है,
अंतरिक्ष को भी ना छोड़ा हमने ये त्रास फैलाया है।

पशु पक्षियों के अश्रुधार का हमको दंड चुकाना है,
जब तक भरपाई ना हो प्रकृति का साथ निभाना है।

धरती को माँ समझकर इसको अब हम सँवारेंगे,
मानव दंभ पर पश्चाताप करेंगे हम घर में ही रहेंगे।

योग करेंगे ध्यान करेंगे हम हर पल घर में ही रहेंगे,
ऐसा करके हम सबमें सकारात्मकता का भाव भरेंगे।

रचयिता 
अर्चना चंद,
सहायक अध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय बलुवाकोट, 
विकास खण्ड-धारचूला,
जनपद-पिथौरागढ़,
उत्तराखण्ड।

Comments

  1. BAHUT HI SATIK AAJ K PRIPREKSH ME.

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  2. Bahut Khub Bhavi🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

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  3. बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई

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