पंछी

मन करता है पंछी सा उड़ जाऊँ मैं
नए नए सन्देश दुनिया में ले जाऊँ मैं
छू लूँ गगन गिरि को
अभिलाषाओं का घर बनाऊँ मैं
मन करता है पंछी सा उड़ जाऊँ मैं
जहाँ न हो भेदभाव न द्वेष भाव
उस नभ के तारे गिन आऊँ मैं
पंछी सा उड़ जाऊँ मैं
पावन निर्मल जल नदियों का
सुंदरता प्रकति की देख आऊँ मैं
पंछी सा उड़ जाऊँमैं
जहां लहलहाए फसलों से खेत
मुस्कान कुसुम की महकती हो
उस पावन धरती को निहारूँ मैं
मन करता है पंछी सा उड़ जाऊँ मैं
जहाँ वन में नाचे मयूर मगन हो
नभ की चाँदनी चमकती हो
उस संसार की सैर कर आऊँ मैं
पंछी सा उड़ जाऊँ मैं

रचयिता
हिमांशी यादव,
सहायक शिक्षिका,
प्राथमिक विद्यालय गोपालपुर,
विकास खण्ड-सफीपुर,
जनपद-उन्नाव।

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