दहेज एक अभिशाप

नीलामी की बोली में,
बिक गया है परिणय बंधन।
शहनाई के सुर से उठता,
कैसा करुण ये क्रंदन।
कन्या का करना पीले हाथ
और उठवाना डोली।
पिता-स्वप्न विकट हो गया,
सुन-सुन करके ये बोली।
शिक्षित और सुशील सुपुत्री,
रुप, गुणों की खान बेटी।
यदि पिता के पास धन नहीं,
चढ़ गयी बलि की बेदी।
देखकर कुकृत्य ऐसा,
सो रहा कैसे समाज।
मिट रही श्रद्धेय नारी,
मूल्यहीन हो करके आज।
       
रचयिता
डॉ0 निधि लता सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय नइयापार खुर्द,
विकास खण्ड-पिपराइच,
जनपद-गोरखपुर।

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