शिक्षक के मन की जिज्ञासा

हिंदी से हम सहमे हैं, कैसे लेखनी उठावें,
अक्षरों में ही उलझ गए, कैसे कविता लिख पावें।

जब बचपन में पढ़ते थे, छ दूजे रूप में हम पाए,
जब बच्चों को लगे पढ़ाने, छ को इस रूप में पाए,
कौन सही और कौन गलत, ये भेद न बता पावें,
हिंदी से  हम सहमे हैं, कैसे लेखनी उठावें।।

जब पढ़ते थे बचपन में, बुद्धिमान ऐसे लिख जावें,
आज जब हम पढ़ावे, बुद् धिमान ऐसे पाए,
सब कहते दोनों सही, मन को कैसे समझावें,
हिंदी से हम सहमे हैं - - -

एक में  आधा और  को पूरा पाएँ,
दूजे में  आधा और  को पूरा पाएँ,
जहाँ मिले हमें उचित मंच, प्रश्न यही उठावें,
हिंदी से हम सहमे हैं - - - -

उच्चारण के दृष्टिकोण से दूजे को सही पाएँ,
सबसे यही निवेदन करबद् ध, बच्चों को सही सिखलावें,
जो गलती की बचपन में, उसको न दोहरावें,
हिंदी से हम सहमे हैं - - - -

गणित में है रुचि हमारी कविता कैसे लिख पाएँ,
आज अपनी जिज्ञासा को, शब्दों में बतलावें,
छोड़ पुरातन पद्धति  को, नवीन पद्  धति  अपनावें,
हिंदी से हम सहमे हैं, कैसे लेखनी उठावें।।

रचयिता
अंजू,
प्राथमिक विद्यालय मेउना,
शिक्षा क्षेत्र-खजुहा,
जनपद-फतेहपुर।

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