माँ मैं हुई कृतार्थ
माँ मैं हुई कृतार्थ, जो मैंने तुमको पाया,
जीवन के इस अग्निपथ पर तुम हो छाया।
जब भी थकी, तुम्हारी गोदी में छिपती हूँ,
भूल के हर दुख, पुनः ऊर्जित हो उठती हूँ।
तुम मेरा संबल,
तुम मेरा अवलंबन हो,
तुम मेरे जीवन में परमेश्वर का साया।
रातें जागीं तुमने मेरे सुख की खातिर!
किस मिट्टी से बनी हुई हो माँ तुम आखिर!
इतनी ममता, इतना साहस,
इतनी करुणा!
ईश्वर कैसे एक हृदय में सब भर पाया?
बाँहों का झूला तेरा वह तेरी लोरी,
मुझसे जुड़ी तेरे सपनों की हर एक डोरी,
हर पल आगे बढ़ो सिखाती तेरी आँखें,
मैं जो कुछ हूँ आज सफल तुमने ही बनाया।
रोग शोक मेरा सब तुमने खुद पर झेला,
शूल स्वयं चुन मुझे दिया खुशियों का मेला।
उऋण हो सकूँ तुमसे यह तो बात असंभव,
अपना जीवन तुमने मेरे लिए लुटाया।
माँ मै हुई कृतार्थ जो मैंने तुमको पाया,
सदा ईश से पहले मस्तक तुम्हें नवाया।
रचयिता
कुहू बनर्जी,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अटकोहना,
विकास खण्ड-नकहा,
जनपद-लखीमपुर खीरी।
जीवन के इस अग्निपथ पर तुम हो छाया।
जब भी थकी, तुम्हारी गोदी में छिपती हूँ,
भूल के हर दुख, पुनः ऊर्जित हो उठती हूँ।
तुम मेरा संबल,
तुम मेरा अवलंबन हो,
तुम मेरे जीवन में परमेश्वर का साया।
रातें जागीं तुमने मेरे सुख की खातिर!
किस मिट्टी से बनी हुई हो माँ तुम आखिर!
इतनी ममता, इतना साहस,
इतनी करुणा!
ईश्वर कैसे एक हृदय में सब भर पाया?
बाँहों का झूला तेरा वह तेरी लोरी,
मुझसे जुड़ी तेरे सपनों की हर एक डोरी,
हर पल आगे बढ़ो सिखाती तेरी आँखें,
मैं जो कुछ हूँ आज सफल तुमने ही बनाया।
रोग शोक मेरा सब तुमने खुद पर झेला,
शूल स्वयं चुन मुझे दिया खुशियों का मेला।
उऋण हो सकूँ तुमसे यह तो बात असंभव,
अपना जीवन तुमने मेरे लिए लुटाया।
माँ मै हुई कृतार्थ जो मैंने तुमको पाया,
सदा ईश से पहले मस्तक तुम्हें नवाया।
रचयिता
कुहू बनर्जी,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अटकोहना,
विकास खण्ड-नकहा,
जनपद-लखीमपुर खीरी।

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