धरती माँ तुम्हें प्रणाम

तर्ज.... जिंदगी एक किराए का घर है।

छोड़कर सबको जाना पड़ेगा।।
ये धरा एक किराए का घर है,
छोड़कर इसको जाना पड़ेगा।।
बनके स्वामी किया इसका दोहन,
माफ करना अब मुश्किल पड़ेगा।।
जिंदगी एक किराए का घर है
..........................
अगर हम सब अभी भी न चेते,
तो अब दंड भी भुगतना पड़ेगा।।
जिंदगी एक किराए का घर है...........
अरे सँभल जा ओ मानव अभी भी,
वरना कीमत चुकाना पड़ेगा।।
जिंदगी एक किराए का घर है.......
प्राणवायु से सींचा था जिसने,
जहर घोला है पीना पड़ेगा।।
जिंदगी एक किराए का घर है........
सुधा दायिनी वसुधा के ऋण को,
आज हम सब भूले पड़े हैं,
श्रृंगार विटप, तरुओं से करके
अब इसका ऋण चुकाना पड़ेगा।।
जिंदगी एक किराए का घर है.........
विकास के पंछी को पकड़ते-पकड़ते,
पग तले खिसक गई है धरा।
थोड़ी देर अब थमना पड़ेगा।।
जिंदगी एक किराए का घर है..........
पंच तत्वों से जन्मे हैं हम सब,
पंचतत्व में ही मिल जाना पड़ेगा।।
जिंदगी एक किराए का घर है।
छोड़कर सब कुछ जाना पड़ेगा।।

रचयिता
सीमा श्रीवास्तव,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय हासिमपुर भेदपुर,
शिक्षा क्षेत्र-हसवा,
जनपद-फतेहपुर।

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