बुद्धम शरणम गच्छामि

बुद्ध, बुद्ध का राग अलापना
है, बेहद आसान...
मगर बुद्ध के पथ पर चलना
न इतना आसान ...
राज मुकुट, सत्ता, महलों को
छोड़ चले थे निर्जन में...
आज कुर्सियों को पाने में
कटाजुद्ध होता है, क्षन में....
ईर्ष्या, द्वेष कहीं अच्छा है
कपट और छल से....
बुद्ध मंत्र अस्तेय रहा है,,
इसको समझो मन से ....
तन की ले ख्वाहिशें अपार
सूटो का रख्खे अंबार ....
बुद्धं शरणं, बुद्धं शरणं का
जपते जब जाप ....
न जाने मुझको तब होता
बहुत अधिक संताप ....
कितने मन मे अन्तर्द्वन्द हुए
   कब ये वैभव आसक्त हुए
राजपार परिवार छोड़कर
     सिद्धार्थ तभी तो बुद्ध हुए

रचयिता
श्रेया द्विवेदी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय देवीगंज,
विकास खण्ड-कड़ा,
जनपद-कौशाम्बी।

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