महात्मा बुद्ध
महात्मा गौतम बुद्ध का
जन्म 563 ईसा पूर्व में लुम्बिनी
(नेपाल) नामक स्थान पर हुआ था। उनके
पिता महाराज शुद्बोधन एवम माता का नाम महामाया देवी था। जन्म के कुछ समय पश्चात ही माँ का देहांत हो
जाने के कारण
उनका पालन - पोषण उनकी विमाता (सौतेली माँ) महाप्रजापति (गौतमी) ने किया। उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया तथा गौतम गोत्र में
पैदा होने के कारण वे गौतम भी कहलाये। महाराज शुदोधन
ने सिद्धार्थ के जन्म के पाँचवें दिन एक नामकरण समारोह आयोजित किया जिसमें 8 ब्राह्मण विद्वानों को महात्मा बुद्ध का भविष्य पढ़ने के लिए
आमंत्रित किया। सभी विद्वानों ने एक ही
तरह की दोहरी भविष्यवाणी
महात्मा बुद्ध के बारे में की - "यह बालक या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या बहुत
बड़ा सन्यासी।" राजा शुद्धोधन ने ब्राह्मणों की भविष्यवाणी से चिंतित होकर मात्र 16
वर्ष की अवस्था मे गौतम बुद्ध का
विवाह यशोधरा नामक कन्या से कर दिया। पिता के द्वारा ऋतुओं के अनुरूप बनाये गए वैभवशाली एवम सभी भोगों से युक्त
महल में गौतम बुद्ध यशोधरा के साथ रहने लगे जहाँ उनको पुत्र रत्न (राहुल) की प्राप्ति हुई। लेकिन विवाह एवम अन्य राजसी सुख - सुविधाओं के बाद भी उनका मन वैराग्य की ओर चल
गया और सम्यक सुख - शांति के लिए उन्होंने अपने परिवार का परित्याग कर दिया।
पत्नी यशोधरा पुत्र राहुल एवम कपिलवस्तु जैसे राज्य का
मोह छोड़कर
सिद्धार्थ तपस्या के लिए निकल पड़े। सिद्धार्थ को बोध गया (बिहार) में निरंजना नदी के तट पर पीपल वृक्ष के नीचे
बोध (ज्ञान) की प्राप्ति हुई जिसके बाद वे भगवान बुद्ध कहलाये और यहीं उन्होंने
अपने प्रथम 5 शिष्यों को बौद्ध धर्म का उपदेश
देकर उन्हें अन्य स्थानों पर बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजा। महात्मा बुद्ध यहीं से एक नए धर्म बौद्ध धर्म के
संस्थापक बने, इतिहास
में यह घटना धर्म - चक्र - प्रवर्तन के नाम से जानी जाती है।
महात्मा बुद्ध 80 वर्ष की उम्र तक बौद्ध धर्म का प्रचार संस्कृत के बजाय तत्कालीन सीधी एवम सरल भाषा पाली में करते रहे। भगवान बुद्ध ने बहुजन हिताय एवम लोक कल्याण के लिए बौद्ध धर्म का प्रचार करने हेतु देश - विदेश तक बौद्ध भिक्षुओं को भेजा।
सम्राट अशोक तथा अन्य कई राजाओं ने बौद्ध धर्म को अपनाया तथा विदेशों में बौद्ध धर्म मे प्रचार में अहम
भूमिका निभाई। मौर्य काल तक आते - आते, बौद्ध धर्म अपने देश भारत से निकलकर चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, वर्मा, मंगोलिया, एवम श्रीलंका आदि
देशों में फैल गया। आज भी उपरोक्त देशों में
बौद्ध धर्म बहुसंख्यक है।
इस प्रकार हम कह सकते है कि बौद्ध धर्म मे 4
चक्रों का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है
-
महाभिनिष्क्रमण जिसमें महात्मा बुद्ध ने सभी वैभव एवम विलास
को त्यागकर सन्यास लिया।
निर्वाण जिसमें उनको पहली बार बोध गया में पीपल वृक्ष
के नीचे ज्ञान की प्राप्ति
हुई और वे बुद्ध कहलाये।
धर्म
- चक्र - प्रवर्तन प्रथम
धर्मोपदेश अपने 5 अनुयायियों को बौद्ध
धर्म का।
महापरिनिर्वाण कुशीनगर में भगवान बुद्ध का देहत्याग।
लेखिका
डॉ0 उषा सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल चकताली,
शिक्षा क्षेत्र-सिरकोनी,
जनपद-जौनपुर।

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