हे! शांतिदूत जीवन है ठहरी
बूँद - बूँद से घड़ा है भरता
ज्ञानी मृत्यु से नहीं है डरता
रात के हो तुम अंतिम प्रहरी
हे! शांतिदूत जीवन है ठहरी।
धरा पर कुछ नहीं है कष्टकारक
जहर मानवों में घुला नहीं है मारक
शक से शक है और भी गहरी,
हे! शांतिदूत जीवन है ठहरी।
करूणा, अहिंसा को देता नया आकार
तुमने युग के हर प्रश्न को दिया सँवार
तेरे जैसा हुआ नहीं धरा पर वक्ता प्रखरी
हे! शांतिदूत जीवन है ठहरी।
अब द्विभाषी चेहरों की दूरी
मुँह में राम बगल में छुरी
द्विभाषी चेहरों की संकट हैं गहरी
हे! शांतिदूत जीवन है ठहरी।
रचयिता
दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल,
प्रधानाध्यापक,
संविलियत विद्यालय सोनवल,
विकास खण्ड-लक्ष्मीपुर,
जनपद-महराजगंज।
ज्ञानी मृत्यु से नहीं है डरता
रात के हो तुम अंतिम प्रहरी
हे! शांतिदूत जीवन है ठहरी।
धरा पर कुछ नहीं है कष्टकारक
जहर मानवों में घुला नहीं है मारक
शक से शक है और भी गहरी,
हे! शांतिदूत जीवन है ठहरी।
करूणा, अहिंसा को देता नया आकार
तुमने युग के हर प्रश्न को दिया सँवार
तेरे जैसा हुआ नहीं धरा पर वक्ता प्रखरी
हे! शांतिदूत जीवन है ठहरी।
अब द्विभाषी चेहरों की दूरी
मुँह में राम बगल में छुरी
द्विभाषी चेहरों की संकट हैं गहरी
हे! शांतिदूत जीवन है ठहरी।
रचयिता
दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल,
प्रधानाध्यापक,
संविलियत विद्यालय सोनवल,
विकास खण्ड-लक्ष्मीपुर,
जनपद-महराजगंज।

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