ममतामयी माँ
नौ महीने गर्भ में धारण कर,
अपने लहू से सींचती है।
हमें कोई चोट न पहुँचे
सारे दर्द वह सहती है।
फ़िर जन्म हमें देकर,
सारे दुःख हर लेती है।
माँ की गोद में आँखें खुलते ही,
ममता की छाँव मिलती है।
जब बीमार पड़ते हैं हम,
डॉक्टर भी बन जाती है।
सारी रात वह जागकर,
लोरी भी सुनाती है।
जब थोड़ा बड़े होते है हम,
उँगली पकड़ चलना हमें सिखाती है। ठोकर लगते ही वह,
पकड़कर हमें उठाती है।
जब पढ़ने हम जाते हैं,
प्यार से टिफिन थमाती है।
घर वापस आने पर वह,
गृहकार्य भी कराती है।
बड़े हो जाने पर हमें वह,
दुनिया की बुरी नजर से बचाती है। सही गलत का फर्क,
हमें वह बतलाती है।
कभी माँ बनकर, कभी सहेली,
और कभी मार्गदर्शक बनकर।
कई भूमिका निभाती है।
रचयिता
कादम्बरी कुशवाहा,
संविलियन विद्यालय सिद्दीकपुर-2,
विकास खण्ड-करंजाकला,
जनपद-जौनपुर।
अपने लहू से सींचती है।
हमें कोई चोट न पहुँचे
सारे दर्द वह सहती है।
फ़िर जन्म हमें देकर,
सारे दुःख हर लेती है।
माँ की गोद में आँखें खुलते ही,
ममता की छाँव मिलती है।
जब बीमार पड़ते हैं हम,
डॉक्टर भी बन जाती है।
सारी रात वह जागकर,
लोरी भी सुनाती है।
जब थोड़ा बड़े होते है हम,
उँगली पकड़ चलना हमें सिखाती है। ठोकर लगते ही वह,
पकड़कर हमें उठाती है।
जब पढ़ने हम जाते हैं,
प्यार से टिफिन थमाती है।
घर वापस आने पर वह,
गृहकार्य भी कराती है।
बड़े हो जाने पर हमें वह,
दुनिया की बुरी नजर से बचाती है। सही गलत का फर्क,
हमें वह बतलाती है।
कभी माँ बनकर, कभी सहेली,
और कभी मार्गदर्शक बनकर।
कई भूमिका निभाती है।
रचयिता
कादम्बरी कुशवाहा,
संविलियन विद्यालय सिद्दीकपुर-2,
विकास खण्ड-करंजाकला,
जनपद-जौनपुर।

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