माँ

चोट लगी थी जब-जब हमको, मलहम लेकर आई माँ।
हर जख्मों का हर सदमों  की, एक ही  तो   दवाई  माँ।
संकट में घिरते  हैं  जब  तब,  लेकर  उड़ी  हवाई  माँ।
भरी वेदना हो मन में  जब,  उसकी   भी   भरपाई  माँ।
बचपन में बीमार हुए तब, उस दिन तो न   खाई   माँ।
हो जाए धनवान  बहुत  पर, उसकी   पाई - पाई   माँ।
थके हुए जब घर पहुँचे, तब खाना  लेकर   आई  माँ।
देख हमारी  खुशियों   को,   हुई  सदा   लहराई    माँ।
बचपन में रगड़ रगड़कर,  करती   थी   नहलाई  माँ।
खड़े हाथ दोनों जोड़े हम, हो जाओ खूब  सहाई  माँ।
दूजा  कोई हाथ  उठा  दे,  करती   खूब   लड़ाई   माँ।
दूर भले ही कितना होते, मन   मन्दिर  में   समाई माँ।

रचयिता
अनुज पटैरया,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय टिकरिया,
विकास क्षेत्र-मानिकपुर,
जनपद-चित्रकूट।

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