प्रतिदिन मातृ दिवस मनाएँगे

अनमोल जन्म दिया जिसने
उसको क्या मोल चुकाएँगे,
माँ के लिए एक दिन ही क्यों?
प्रतिदिन मातृ दिवस मनाएँगे।

आँखें खोली इस दुनिया में
माँ की गोदी में पाया है,
संभव ना था चलना मेरा
उँगली पकड़ चलना सिखाया है।

मेरी अपनी भाषा न थी
माँ ने ही तो सिखलाया है,
जीवन अबूझ पहेली थी
जिसे सुलझाना सिखलाया है।

जीवन के रंगों से परिचय
माँ ने ही तो करवाया है,
संबंधों को जीना भी
माँ ने ही सिखलाया है।

माँ की ममता से सिंचित
हैं सृष्टि के जीव सभी,
माँ ही करूणा, माँ ही प्रेम
माँ जैसा है स्नेह अमिट।

माँ ने उपकार किए कितने
न शब्दों में कह पाएँगे,
माँ के आँचल की छाया में
सारा जीवन हम बिताएँगे।

बच्चों को संस्कार दें ऐसे
कि माता न अपमानित हो,
न खुले कहीं वृद्धाश्रम
जिसमें माता आश्रित हो।

माँ के लिए एक दिन ही क्यों?
प्रतिदिन मातृ दिवस मनाएँगे।।

रचयिता
सुमन पांडेय,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय टिकरी मनौटी,
शिक्षा क्षेत्र -खजुहा,
जनपद-फतेहपुर।

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