महाराणा प्रताप

सूरज की किरणों से चमका और हुआ रोशन,
शौर्य, पराक्रम की गाथा से अभिसिंचित जीवन।
असि जब करती थी तांडव, अरिदल में हो क्रंदन,
शौर्य, पराक्रम की गाथा से अभिसिंचित जीवन।।

ज्येष्ठ मास की तिथि तृतीया, माँ का गर्भ कृतार्थ किया,
वीर, सूरमा, हिम्मतवालों का जीवन चरितार्थ किया।
जन्म लिया राणा ने जब, हर्षाये सब तन मन,
शौर्य, पराक्रम की गाथा से अभिसिंचित जीवन।।

कभी मित्र तुम, कभी शत्रु फिर काल कभी बन जाते हो,
युद्धक्षेत्र में रणकौशल से, अरिमर्दन कर जाते हो।
स्वाभिमान के अमर पुजारी, हर वीर की हो धड़कन,
शौर्य, पराक्रम की गाथा से अभिसिंचित जीवन।।

तुम ही हो वो वीर, के जिसने हाहाकार मचाया,
अकबर से लेकर भारत के हर दुश्मन को हराया।
हल्दी घाटी जीती तुमने और मेवाड़ का मैराथन,
शौर्य, पराक्रम की गाथा से अभिसिंचित जीवन।।

उदयसिंह के ज्येष्ठ पुत्र, माता का जीवन धन्य किया,
अश्व निराला वायुपुत्र, चेतक उसको अनुमन्य किया।
घास की रोटी खाई और पत्तल में किया भोजन,
शौर्य, पराक्रम की गाथा से अभिसिंचित जीवन।

लड़ी लड़ाई और जीता हर शत्रु का सिंहासन,
शौर्य, पराक्रम की गाथा से अभिसिंचित जीवन।

राणा प्रताप का प्रिय मित्रों कुछ ऐसा था जीवन,
शौर्य, पराक्रम की गाथा से अभिसिंचित जीवन।।

रचयिता
रघुनाथ द्विवेदी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय चायल, 
विकास खण्ड-चायल,
जनपद-कौशाम्बी।

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