माँ

दुनिया में इस शब्द का कोई मोल नहीं,
तोल सके जो इसको ऐसा कोई तोल नहीं।
दिखने में भले ही बहुत छोटा यह शब्द,
पर ब्रह्मांड से भी बड़ा इसका अर्थ।

इसके जैसा कोई मीठा बोल नहीं,
माँ से ज्यादा कोई भी अनमोल नहीं।
क्या करें गुणगान इस शब्द का,
इस शब्द की तो महिमा अपरंपार है।
 इस सृष्टि में मानव को ही नहीं,
जीवों को भी मिला यह  उपहार है।

खिल उठता है घर का कोना-कोना,
जब माँ शब्द गुंजायमान होता है।
महक उठता है  वह घर आँगन,
जहाँ एक माँ का सम्मान होता है।

 मैं भी एक माँ हूँ, हूँ माँ की एक बेटी,
इसीलिए करती हूँ विनती सभी से एक छोटी।
महसूस करें उस दर्द को हम,
जो होता बहुत है पर दिखता कम,
क्योंकि मुस्कुराते चेहरे से छुप जाती है,
उसकी वह खामोश आँखें नम।

प्यार तो सभी रिश्ते में बेशुमार होता है,
पर माँ की ममता सा निस्वार्थ नहीं होता है।
हँसती है, हँसाती है, पर जग को नहीं रुलाती है,
हजार मुश्किलों से अकेले ही लड़ जाती है।
अपनाकर सभी के दुख दर्द,
पर फिर भी मंद-मंद मुस्काती है।

 अद्वितीय है, अतुलनीय है, अद्भुत है।
  माँ तो बस माँ है।

रचयिता
ममता धामी,
सहायक अध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय रतोड़ा,
विकास खण्ड-बेतालघाट,
जनपद-नैनीताल।

Comments

  1. बहुत ही सुन्दर
    मां ही इस जीवन का आधार है

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  2. बहुत ही अच्छी कविता

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