माँ

माँ शब्द का पहली बार मोल था जाना,
सहम भीड़ से जब तेरा आँचल था थामा।

मेरे हर सपने को कैसे,
बिन देखे तूने था जाना।
टूटी गुड़िया को समेटकर,
कैसे तूने मुझे बिंध डाला।

देख रही थी दूर खड़ी तू,
अपनी सूती साड़ी में।
साइकिल लेकर दौड़ लगाती,
जब मैं अपनी ही मस्ती में।

नहीं खबर थी कितने दिन तक,
तू न सोई चिंता में।
"माँ" कहते ही तू उठ पड़ती,
चिपका लेती सीने में।

सच कहती हूँ मैं इस पल में
भीगी आँखें, रोती मन में,
सदा रहूँ मैं तेरे पास,
मेरी हिम्मत तू है आज।

आज भी जब कुम्हलाती हूँ,
तेरी छाया ही पाती हूँ।
शीतलता का रूप है माँ तू,
मैंने हर पल जाना माँ।
'माँ' शब्द का मोल आज भी,
इसी भीड़ में जाना माँ...
             
रचयिता
रश्मि मिश्रा,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय मरुआन,
विकास खण्ड-बाबा बेलखरनाथ धाम,
जनपद-प्रतापगढ़।

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