परिवार

सम्बन्धों की डोर सजा, बच्चे, बूढ़े और जवां।
सुख- दुःख निभाते हैं, परिवार होता वहाँ।।

बुजुर्गों का आशीर्वाद, ममता दुलार वहाँ।
कुछ सख्त फटकार, परिवार होता वहाँ।।

समाज निर्माण की है पाठशाला जहाँ-जहाँ।
प्रथम इकाई ही परिवार होता वहाँ।।

प्रेम, सदभाव, न्याय, मूलभूत गुण यहाँ।
पनपते बेहिचक, परिवार होता वहाँ।।

वो परिवार आदर्श, बच्चे, बूढ़े होते जहाँ।
आदर, समर्पण भी, सीखते हैं बच्चे वहाँ।।

संयुक्त परिवार की, है पुरानी रीत यहाँ।
एकल की चाह करें, संयुक्त अब हैं कहाँ।।

यही दुष्परिणाम है, बचपन खोया यहाँ।
मात-पिता का संग है, दादा-दादी रहें कहाँ।।

आज फिर लौट चलो, मिलजुल रहें यहाँ।
आँगन चहके यहाँ, बचपन लौटे यहाँ।।

परिवार सिखाता है, जोड़कर रहना यूँ।
मिलकर जीना होगा, परिवार होता वही।।

रचयिता
मंजु पांगती "मन",
प्रधानाध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय ग्वालदम,
संकुल-तलवाड़ी,
विकास खण्ड-थराली,
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

Comments

  1. बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई

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