माँ

माँ ममता का स्वरूप है
ईश्वर को भी कबूल है।

माँ नदियों का निर्मल जल है
हवा का शीतल झोंका है माँ।

माँ का तो कोई मोल नहीं है       
माँ जगत में अनमोल है।

सृष्टि का सृजन करना
खून देकर हमें सींचना।

वेदना सहकर दुनिया में लाना
सभी दुखों को खुद उठाना।

अपने मुँह का निवाला खिलाना
खुद भूखे ही सो जाना।

हमें सुलाया सूखे में
खुद गीले में रात बिताना।

माँ का है उपकार धरा पर
माँ नहीं तो धरा नहीं।

 माँ का आँचल शीतल छाया
जो है माँ के चरणों में।

माँ तो घर को घर बनाती
माँ जीने की राह दिखाती।

माँ प्रथम पाठशाला होती
नैतिक मूल्यों को समझाती।

इनको कभी ना तुम दुख देना
ईश्वर से पहले दर्जा देना।

रचयिता                       
विजय लक्ष्मी यादव,
सहायक अध्यापक,
अभिनव इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल सिद्दिकीपुर-1
विकास खण्ड-करंजाकला,
जनपद-जौनपुर।

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