मन द्रवित है
मन द्रवित है भाव उठते नहीं,
कण्ठ प्यासा, ये हाथ असमर्थ हैं।
विश्व-कल्याण की सोच है ही नहीं,
अब कल्पनाएँ मंगल की व्यर्थ हैं।
शीतल बहती हवाएँ भी शान्त हैं,
पेड़-पौधों का नित जो क्षरण हो रहा।
प्रकृति-प्रलय की दुर्दशा देखिए,
हरियाली का धरा से हरण हो रहा।
नदी-ताल-तलय्या जल-मुक्त हैं,
जल बिन जीवन मृतक हो गया।
खौफ़ जल-संकट का उन्मुक्त है,
आदमी ऐसा विष-बीज बो गया।
देखते-देखते हाय क्या हो गया?
जल की आग से लोग जलने लगे।
मुस्कुराहट छिनी ये नयन रो पड़े,
ये विवशता हम हाथ मलने लगे।
पेड़-पौधे, नित संचय करें जल,
नदियों में धारा बहे कल-कल।
कण्ठ अवरुद्ध, हाथ असमर्थ हैं,
लोक मंगल की भावना ही नहीं।
अब कल्पनाएँ मंगल की व्यर्थ हैं।।
कण्ठ प्यासा, ये हाथ असमर्थ हैं।
विश्व-कल्याण की सोच है ही नहीं,
अब कल्पनाएँ मंगल की व्यर्थ हैं।
शीतल बहती हवाएँ भी शान्त हैं,
पेड़-पौधों का नित जो क्षरण हो रहा।
प्रकृति-प्रलय की दुर्दशा देखिए,
हरियाली का धरा से हरण हो रहा।
नदी-ताल-तलय्या जल-मुक्त हैं,
जल बिन जीवन मृतक हो गया।
खौफ़ जल-संकट का उन्मुक्त है,
आदमी ऐसा विष-बीज बो गया।
देखते-देखते हाय क्या हो गया?
जल की आग से लोग जलने लगे।
मुस्कुराहट छिनी ये नयन रो पड़े,
ये विवशता हम हाथ मलने लगे।
पेड़-पौधे, नित संचय करें जल,
नदियों में धारा बहे कल-कल।
कण्ठ अवरुद्ध, हाथ असमर्थ हैं,
लोक मंगल की भावना ही नहीं।
अब कल्पनाएँ मंगल की व्यर्थ हैं।।
रचयिता
रणविजय निषाद(शिक्षक),
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय कन्थुवा,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय कन्थुवा,
विकास खण्ड-कड़ा,

बेहतरीन रचना👌👌👌👌👌💐💐💐💐💐💐
ReplyDeleteबेहतरीन रचना👌👌👌👌👌💐💐💐💐💐💐
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