मन द्रवित है

मन    द्रवित है  भाव उठते नहीं,
कण्ठ प्यासा, ये हाथ असमर्थ हैं।
विश्व-कल्याण की सोच है ही नहीं,
अब कल्पनाएँ मंगल की व्यर्थ हैं।

शीतल बहती हवाएँ भी शान्त हैं,
पेड़-पौधों का नित जो क्षरण हो रहा।
प्रकृति-प्रलय की  दुर्दशा देखिए,
हरियाली का धरा से हरण हो रहा।

नदी-ताल-तलय्या  जल-मुक्त हैं,
जल बिन जीवन  मृतक हो गया।
खौफ़  जल-संकट का उन्मुक्त है,
आदमी ऐसा विष-बीज  बो गया।

देखते-देखते  हाय क्या  हो गया?
जल की आग से लोग जलने लगे।
मुस्कुराहट छिनी ये  नयन रो पड़े,
ये विवशता  हम  हाथ मलने लगे।

पेड़-पौधे, नित संचय करें  जल,
नदियों  में   धारा बहे कल-कल।
कण्ठ अवरुद्ध,  हाथ असमर्थ हैं,
लोक मंगल की भावना ही नहीं।
अब कल्पनाएँ मंगल की व्यर्थ हैं।।

रचयिता
रणविजय निषाद(शिक्षक),
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय कन्थुवा,      
विकास खण्ड-कड़ा, 
जनपद-कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश)।

Comments

  1. बेहतरीन रचना👌👌👌👌👌💐💐💐💐💐💐

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  2. बेहतरीन रचना👌👌👌👌👌💐💐💐💐💐💐

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