मेरी प्यारी माँ
मुझे याद है माँ, मुझे याद है माँ,
तेरे अंक की खुशबू अब भी याद है माँ।
जब मैं नन्हें कदमों से चलती थी,
चलते-चलते जब लड़खड़ाती थी।
तू दौड़ के अंक में भर लेती थी,
तेरा प्यार था माँ, दुलार था माँ।
पर जब मैं जिद पर अड़ जाती थी,
तू एक न मेरी सुनती थी,
सजा बड़ी तू देती थी,
मैं रोती ही रह जाती थी।
प्यार भी था, दुलार भी था,
पर नियम की तू भी पक्की थी।
कब बाँध दिया अनुशासन से,
कब बाँध दिया अपने नियमों से,
कैसे दिए संस्कार मुझे।
तेरी छवि की एक छाप हूँ मैं,
हाँ तेरी ही परछाई हूँ मैं।
मुझे याद है माँ मुझे याद है माँ
कैसे तू सुबह जगाती थी,
अपने संस्कार सजाती थी।
अपने हर गुण मुझमें भर देती थी,
है तेरा ही यह वरदान मुझे,
दे दिया है तूने जो ज्ञान मुझे मुमकिन कहाँ,
मुमकिन है कहाँ?
मुझे याद है माँ मुझे याद है माँ
खेल कराकर, लिखा- पढ़ाकर,
सिलाई बुनाई पकवान बनाकर।
सब याद है माँ, सब याद है माँ,
सोचा करती हूँ तेरा कितना बलिदान है माँ।
मेरी भाषा, तेरा वरदान है माँ।
जिसने दे दी, यह पहचान है माँ।
कितना भी लिखूँ, कम है बहुत
तेरे लिए शब्द नहीं।
तू जान है,
मेरी स्वाभिमान है माँ।
एक-एक शब्द तेरा,
एक-एक सीख तेरी याद है माँ।
हाँ मुझे याद है माँ!
अपने बच्चों को दे पाऊँ एक यही वरदान दो माँ,
एक यही वरदान दो मां!
तू मेरे जीवन की डोर है माँ,
मेरी शान है तू आन है माँ।
आशीष तेरी, मेरा अरमान है माँ,
तू है एक तरु तेरी डाल है वंदना
तेरी छाया का अरमान है माँ।
बस इतना सा अरमान है माँ।
रचयिता
वंदना यादव,
प्रधानाध्यापक,
इंग्लिश मीडियम कंपोजिट लोढवारा,
विकास खण्ड व जनपद-चित्रकूट।
तेरे अंक की खुशबू अब भी याद है माँ।
जब मैं नन्हें कदमों से चलती थी,
चलते-चलते जब लड़खड़ाती थी।
तू दौड़ के अंक में भर लेती थी,
तेरा प्यार था माँ, दुलार था माँ।
पर जब मैं जिद पर अड़ जाती थी,
तू एक न मेरी सुनती थी,
सजा बड़ी तू देती थी,
मैं रोती ही रह जाती थी।
प्यार भी था, दुलार भी था,
पर नियम की तू भी पक्की थी।
कब बाँध दिया अनुशासन से,
कब बाँध दिया अपने नियमों से,
कैसे दिए संस्कार मुझे।
तेरी छवि की एक छाप हूँ मैं,
हाँ तेरी ही परछाई हूँ मैं।
मुझे याद है माँ मुझे याद है माँ
कैसे तू सुबह जगाती थी,
अपने संस्कार सजाती थी।
अपने हर गुण मुझमें भर देती थी,
है तेरा ही यह वरदान मुझे,
दे दिया है तूने जो ज्ञान मुझे मुमकिन कहाँ,
मुमकिन है कहाँ?
मुझे याद है माँ मुझे याद है माँ
खेल कराकर, लिखा- पढ़ाकर,
सिलाई बुनाई पकवान बनाकर।
सब याद है माँ, सब याद है माँ,
सोचा करती हूँ तेरा कितना बलिदान है माँ।
मेरी भाषा, तेरा वरदान है माँ।
जिसने दे दी, यह पहचान है माँ।
कितना भी लिखूँ, कम है बहुत
तेरे लिए शब्द नहीं।
तू जान है,
मेरी स्वाभिमान है माँ।
एक-एक शब्द तेरा,
एक-एक सीख तेरी याद है माँ।
हाँ मुझे याद है माँ!
अपने बच्चों को दे पाऊँ एक यही वरदान दो माँ,
एक यही वरदान दो मां!
तू मेरे जीवन की डोर है माँ,
मेरी शान है तू आन है माँ।
आशीष तेरी, मेरा अरमान है माँ,
तू है एक तरु तेरी डाल है वंदना
तेरी छाया का अरमान है माँ।
बस इतना सा अरमान है माँ।
रचयिता
वंदना यादव,
प्रधानाध्यापक,
इंग्लिश मीडियम कंपोजिट लोढवारा,
विकास खण्ड व जनपद-चित्रकूट।

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