कठिन समय

हरे-भरे जीवन में,  पतझड़ की तरह आता है..
विपत्तियों के साथ, नयी सीखें देकर जाता है..
मेहंदी की तरह पीसकर, रंगत मोहक लाता है...
कठिन समय ही तो जीवन का, सही अर्थ समझाता है।

धीरज रेत की भाँति, क्यों फिसलता जाता है..
उम्मीदों का दिनकर, क्यों अस्त हो जाता है...
नेत्रों के सामने, क्यों तम सा छा जाता है..
कठिन समय ही तो हमें, अजय योद्धा बनाता है।

लेकर परीक्षाएँ हमारी, नित नवीन सिखलाता है..
 जूझकर तूफानों से, मानव चट्टान बन जाता है...
साहस के बाँध पर, सुख का सागर वह लाँघ जाता है...
कठिन समय ही तो, जीने की कला सिखाता है।

क्या सदा सुखी मानव, सुख का मोल जान पाता है...
एक प्यासा ही तो, नीर की अमूल्यता बता पाता है..
सेवन नित मिष्ठान का, जिव्हा को तीखे हेतु तरसाता है...
कठिन समय ही जीवन को, सार्थक व संतुलित बनाता है।

रचयिता
दीप्ति खुराना,
सहायक अध्यापक, 
जूनियर कम्पोजिट विद्यालय पंडिया,
विकास खण्ड-कुन्दरकी, 
जनपद-मुरादाबाद।

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