माँ

दुलारती, प्यार करती है
गोद ले, बाँह में भरती है
 गीले बिस्तर में सोती है
हृदय लगा, भूख मिटाती है
चूमकर, खुशियाँ मनाती है
अपने मन को बहलाती है
तन के खून से सींचती है
तब अस्तित्व में लाती है
तन साफ कर नहलाती है
सुन्दर कपड़े पहनाती है
नजर न लगे टीका लगाती है
चलाने का प्रयास करती है
 लाल बोले वह बोलती है
कुछ भी न हो यह सोचती है
सबकी नजर से बचाती है
हर एक जिद्द पूरी करती है
नखरे वह सारी उठाती है
धन्य है, सब कुछ त्यागती है
वही है जो माँ कहलाती है
   
रचयिता
आनन्द पाठक 'अभिनव',
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय खाचकी मई,
विकास खण्ड-कड़ा,
जनपद-कौशाम्बी।

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