मजबूर 'मजदूर'
राह नहीं आसान, मंजिल अभी दूर है।
पथरीले रास्तों पर चलता ये मजबूर मजदूर है।।
हर दिन की चुनौती आँखों में लिए,
निकल पड़ता है दो वक्त की रोटी के लिए,
भूखे पेट को बाँध सोना इसका दस्तूर है।
पथरीले रास्तों पर चलता ये मजबूर मजदूर है।।
लाख घटाएं बरसें चाहे हरियाली लहराए।
इसके मन के शुष्क नगर के सारे पत्ते मुरझाए।
प्रकृति के विरुद्ध इसके मन का दस्तूर है।
पथरीले रास्तों पर चलता ये मजबूर मज़दूर है।।
छोटी छोटी इच्छाएँ और अनन्त आकाश है।
उड़ना चाहे मन इसका मगर पंख ना परवाज़ है
दूसरों की मेहरबानी पर ये जीने को मजबूर है।
पथरीले रास्तो पर चलता ये मजबूर मजदूर है।
रचयिता
डॉ0 रेणु देवी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय नवादा,
विकास खण्ड व जनपद-हापुड़।
पथरीले रास्तों पर चलता ये मजबूर मजदूर है।।
हर दिन की चुनौती आँखों में लिए,
निकल पड़ता है दो वक्त की रोटी के लिए,
भूखे पेट को बाँध सोना इसका दस्तूर है।
पथरीले रास्तों पर चलता ये मजबूर मजदूर है।।
लाख घटाएं बरसें चाहे हरियाली लहराए।
इसके मन के शुष्क नगर के सारे पत्ते मुरझाए।
प्रकृति के विरुद्ध इसके मन का दस्तूर है।
पथरीले रास्तों पर चलता ये मजबूर मज़दूर है।।
छोटी छोटी इच्छाएँ और अनन्त आकाश है।
उड़ना चाहे मन इसका मगर पंख ना परवाज़ है
दूसरों की मेहरबानी पर ये जीने को मजबूर है।
पथरीले रास्तो पर चलता ये मजबूर मजदूर है।
रचयिता
डॉ0 रेणु देवी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय नवादा,
विकास खण्ड व जनपद-हापुड़।

सुन्दर
ReplyDeleteBeautiful thoughts Dr.Renu mam(from Dr.Suman Agarwal)
ReplyDeleteBeautiful expression (Bushra siddiqui )
ReplyDeleteसुंदर रचना
ReplyDeleteTouchable lines(pooja chaturvedi)
ReplyDeleteअति सुंदर रचना
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