जीविकोपार्जन

कलियों के रस चोरी वाले,                     
सदा खार से भय खाएँ तो।
                             
और हृदय के चोरी वाले,                         
हर काँटों को ठुकराएँ तो।     

नहीं हर्ष का मधु पा सकते,
जीवन के हर नये स्वप्न तो।                             
           
सदा पर्वतों के वनवासी,     
बीहड़ में यदि घबराएँ तो।

और तपस्या के बिन अपना,       
ढोंग सभी को दिखलाएँ तो।

नहीं प्रभु को पा सकते वो,
अपने जीवन दर्शन में तो।

मौन यदि हम यम के आगे,
भयभीत अगर हो जाएँ तो।

और गंगा यमुना तटवासी,   
लहरों से ही डर जाएँ तो। 

गुबरागिन अंदर का कूड़ा, 
अंदर ही रखती जाए तो। 

नहीं उन्नति क्षण पा सकते,
मानव जीवन में अपने तो।     

यदि पुजारी पूजे बाहर के,
पत्थर, पूजा सामानों से तो।     
   
रचयिता
डॉ0 कविता सक्सैना,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय छरौरा,
विकास खण्ड व जनपद- मथुरा।

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