बाल-श्रम, बाल-व्यापार
हे भगवान!
तुमने जिस इंसान को,
इतने प्यार से बनाया।
आकर इस दुनिया में उसने,
तुम्हारे प्यार को भुनाया।
भेजा था जिसे यहाँ,
किसी वैसाखी वाले को,
सहारा देने के लिए।
किसी अंधे को,
रास्ते में किनारा देने के लिए।
गूंगे और बहरों के,
संवेदनाओं को पढ़ने के लिए।
किसी कराहते हुए की,
वेदनाओं को हरने के लिए।
मगर तुम्हारा वही इंसान,
जिसके तुम पालनहार हो।
यहाँ आकर उसने,
कितनों का दुर्भाग्य बनाया।
वैसाखी थमा दिया,
किसी चंगे बच्चे को।
जो दुनिया के हर रंग देखता था,
उसे अंधा बना दिया।
अपनी करनी को छुपाने के लिए,
उन्हें बेजुबान कर दिया।
बिखेर दिया उन्हें सड़कों पर,
बेचारगी के बीज की तरह।
तोड़ता गया उन पर लगे
सहानुभूति के फूल।
इस तरह फैलाता गया,
निर्मम बाल-व्यापार।
हे भगवान!
तुम्हें ही ललकारता,
बनकर रुपयों का सौदागर।
क्यों नही तुम लेते,
फिर एक अवतार।
उस बच्चे की जगह,
खड़ा कर देते उस इंसान को
और दिखा देते उसकी औकात।
रचयिता
डॉ0 निधि लता सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय नइयापार खुर्द,
विकास खण्ड-पिपराइच,
जनपद-गोरखपुर।
तुमने जिस इंसान को,
इतने प्यार से बनाया।
आकर इस दुनिया में उसने,
तुम्हारे प्यार को भुनाया।
भेजा था जिसे यहाँ,
किसी वैसाखी वाले को,
सहारा देने के लिए।
किसी अंधे को,
रास्ते में किनारा देने के लिए।
गूंगे और बहरों के,
संवेदनाओं को पढ़ने के लिए।
किसी कराहते हुए की,
वेदनाओं को हरने के लिए।
मगर तुम्हारा वही इंसान,
जिसके तुम पालनहार हो।
यहाँ आकर उसने,
कितनों का दुर्भाग्य बनाया।
वैसाखी थमा दिया,
किसी चंगे बच्चे को।
जो दुनिया के हर रंग देखता था,
उसे अंधा बना दिया।
अपनी करनी को छुपाने के लिए,
उन्हें बेजुबान कर दिया।
बिखेर दिया उन्हें सड़कों पर,
बेचारगी के बीज की तरह।
तोड़ता गया उन पर लगे
सहानुभूति के फूल।
इस तरह फैलाता गया,
निर्मम बाल-व्यापार।
हे भगवान!
तुम्हें ही ललकारता,
बनकर रुपयों का सौदागर।
क्यों नही तुम लेते,
फिर एक अवतार।
उस बच्चे की जगह,
खड़ा कर देते उस इंसान को
और दिखा देते उसकी औकात।
रचयिता
डॉ0 निधि लता सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय नइयापार खुर्द,
विकास खण्ड-पिपराइच,
जनपद-गोरखपुर।

Comments
Post a Comment