मजदूर दिवस

हाँ वह एक मजदूर है

वह हाड़ माँस खपाता है
वह ईंट पत्थर उठाता है,
वह इमारतें बनाता है
वह सड़कें बनाता है।

हाँ वह एक मजदूर है।।

वह दिन रात जिस्म जलाता है
वह लू के थपेड़े खाता है,
सर्द रातों में ठिठुरता जाता है
बरसातों में पूरी रात भीग बिताता है।

हाँ वह एक मजदूर है।।

हाड़ तोड़ मेहनत करता है
पर चंद सिक्के ही कमा पाता है,
उनको भी बचाने की खातिर
अक्सर भूखे पेट सो जाता है।

हाँ वह एक मजदूर है।।

हमारी गंदगी को हटाता है
खुद उसमें सन जाता है
सबका मैला उठाने को
खुद मैला हो जाता है।

हाँ वह एक मजदूर है।।

घर पर कुछ पैसे भेज पाए
दिन रात बोझ उठाता है,
बिस्तर की क्या पड़ी है उसको
सरे जमीन पर यूँ ही सो जाता है।

हाँ वह एक मजदूर है।।

भीख माँगकर जी सकता था
पर खुद्दारी की ही खाता है
खुद की जरूरतें खुद के सपने
सब भूल बस मजदूरी करता जाता है।

हाँ वह एक मजदूर ही तो हो सकता है।।।

रचयिता
अंजली मिश्रा,
सहायक शिक्षिका,
प्राथमिक विद्यालय टिकरा,
विकास खण्ड-देवमई, 
जनपद-फतेहपुर।

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