छपाक

ये संकरी गलियाँ ये तन्हा रास्ते,
आवाज़ देते रहे हम अपने वास्ते
क्यों चुप था तुम्हारा पुरूषत्व
जब छीन गया मेरा नारीत्व
बन्द कमरों में ही क्यों दिखाते हो मर्दानगी
कभी सोचा है कैसे जीते हैं हम बदनुमा दामन लिए।     
कब तलक यूँ ही छोटी सोच रखोगे अपनी ए पुरूष।
कोरे कागज में तो प्यार लिखाना सभी हैं जानते।
थाम लो वो बदनुमा आँचल तो मैं पहचान लूँ
हूँ मैं अबला तभी तक ये तुम जान लेना
जब तलक माथे सजता नाम तेरा।
फिर कभी कोई लक्ष्मी ना इस दर्द का शिकार हो।
फिर कभी न छपाक पे कोई पुरूष शर्मसार हो।
वेदना का दर्द तो ताउम्र मन में रहेगा।
जिंदगी जीनी है फिर भी मेरा प्रण रहेगा।
प्यार करती थी मैं तुझसे लेकिन ए प्रिये
माँ-बाप भी तो थे मेरे लिए कुछ सपने लिए।
अंत करती हूँ मैं अब अपने संवेदना का
मैं जिऊँगी अब और बेहतर
ए पुरूष तू अपना सोच ले।
ये संकरी गलियाँ ये तन्हा रास्ते
आवाज़ देते रहे हम अपने वास्ते।

रचयिता
पंकज कुमार गुप्ता,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय सेमरी,
विकास खण्ड-गगहा
जनपद-गोरखपुर।

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